शनिवार, 12 सितंबर 2009

शनि कि उच्च और निम्न स्थति के खगोलीय मायने

ग्रहों की स्थिति के आधार पर फलित की गणना करते समय एक ज्योतिषी यहाँ भूल जाता है कि ग्रहों कि स्थिति के खगोलीय मायने क्या होते है,और तभी ग्रहों के बारे में भ्रांत विचारों का प्रचार होता है.आज शनि कि उच्च और निम्न स्थति पर चर्चा करते है.शनि के बारे में बहुत डर का प्रचार किया गया है.शनि कि साढे साती,ढैया,शनि का नीच राशि उच्च राशिः में होना,वक्री होना इत्यादि को लेकर कई अवैज्ञानिक भ्रांतिया प्रचलित है.इसको समझाने के लिए आज हम शनि के उच्च राशि और नीच राशि में होने के खगोलीय मतलब पर चर्चा करेंगे.
शनि तुला राशि में उच्च का होता है.इसको समझने के लिए हम एक बड़े वृत्त में मेष से मीन तक की बारह राशियों को क्रम से इस तरह से रखें कि मेष के ठीक सामने तुला राशि हो,वृष के ठीक सामने वृश्चिक,मिथुन के ठीक सामने धनु,कर्क के सामने मकर,सिंह के सामने कुम्भ और कन्या के ठीक सामने मीन राशि हो.ये सभी राशियाँ तारामंडल है और बीच में पृथिवी को रखें....वास्तव में पृथिवी कि अपने अक्ष पर घूर्णन और सूर्य के परिभ्रमण से इन राशियों के सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन आता है..अब जब किसी राशिः तारामंडल ने पृथिवी को मिलाने वाली रेखा के बीच में कोई ग्रह आजाता है तो वह ग्रह उस राशि में स्थित माना जाता है.तुला राशि तारामंडल से एक ऊर्जा रेखा निकलती है जो शनि से गुजरने पर अपने ऊर्जामान में बहुगुणित होती हुई पृथिवी पर पहुँचती है.यह शनि की उच्च स्थिति होती है.इसके विपरीत अगर शनि मेष तारामंडल और पृथिवी के बीच स्थित हो तो तुला राशि तारामंडल से आने वाली ऊर्जा रेखा अपने क्षीण बल से पहले पृथिवी पर आकर शनि तक पहुँचेगी और वहां से बहुगुणित ऊर्जा में बदल कर अन्तरिक्ष में विलीन हो जायेगी...अर्थात पृथिवी के लिए शनि की ऊर्जा शून्य अथवा नकारात्मक(दिशा के अनुसार)होगी और शनि नीच राशि में माना जाएगा.
चूंकि शनि अपने ऊर्जा स्पंदन के लिए तुला राशि पर निर्भर है अतः जातक पर शनि का प्रभाव इस प्रकार तुला राशि के सापेक्ष पृथिवी की स्थिति पर निर्भर करता है.तो अगली बार शनि के प्रभाव से घबराएं नहीं...!

6 टिप्‍पणियां:

  1. तुला राशि तारामंडल से एक ऊर्जा रेखा निकलती है जो शनि से गुजरने पर अपने ऊर्जामान में बहुगुणित होती हुई पृथिवी पर पहुँचती है.यह शनि की उच्च स्थिति होती है.इसके विपरीत अगर शनि मेष तारामंडल और पृथिवी के बीच स्थित हो तो तुला राशि तारामंडल से आने वाली ऊर्जा रेखा अपने क्षीण बल से पहले पृथिवी पर आकर शनि तक पहुँचेगी और वहां से बहुगुणित ऊर्जा में बदल कर अन्तरिक्ष में विलीन हो जायेगी...अर्थात पृथिवी के लिए शनि की ऊर्जा शून्य अथवा नकारात्मक(दिशा के अनुसार)होगी और शनि नीच राशि में माना जाएगा.
    यह कौन से वैज्ञानिक का शोध परिणाम है? बताएंगे। या केवल अनुमान है?

    उत्तर देंहटाएं
  2. पाखीजी, बहुत सटीक विवेचन किया है आपने शनि की उच्च और निम्न स्थिति को समझाने के लिए......लेकिन कथ्य कुछ कम है....थोड़े विस्तार की और ज़रूरत है........ भारतीय विद्याभवन नई दिल्ली के कुछ ज्योतिष सीखने वाले विद्यार्थियों को आपका ब्लाग सुझाया है ताकि इससे लाभ ले सकें....आशा है कुछ और ज़्यादा देने का प्रयास करेंगे.....गुरु तुल्य हैं आप..

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक शानदार ब्लॉग...आगे भी ऐसी ही पोस्टों का इंतजार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  4. शुक्रिया दिनेश राय साहब का,राजेश्वर जी का और कुलवंत जी का....यह अनुमान नहीं है शत प्रतिशत वैज्ञानिक तथ्य और कथ्य है.भारतीय ज्योतिष शास्त्र में जातक का जन्म स्थान हमेशा पृथिवी ही होती है राशियां तारामंडल का अध्ययन पृथिवी केन्द्रित ही होता है...अर्थात पृथिवी को केंद्र में मानते हुए गणनाएं की जाती है...यह खगोल वैज्ञानिक तथ्य कोई भी साधारण खगोल विज्ञानं का छात्र आपको बता सकता है..रही ऊर्जा प्रवाह की बात यह ज्योतिष को समझने की अंतर्निहित अवधारणाएं है जो भारतीय ज्योतिष के सामान्य सिद्धांतो के अनुरूप है..जिन्हें मैं अपने ऊर्जा सिद्धांत के माध्यम से सरलीकृत करने का प्रयास कर रहा हूँ...और चाहता हूँ कि भारतीय ज्योतिष शास्त्र के प्रति फैली भ्रांतियों का निराकरण कर सकूं..अपने आने वाले ब्लॉग में मैं चाहूंगा कि यह अवधारणा ज्यादा स्पष्ट कर सकूं..

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी लेखनी को मेरा नमन स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं